बिहार

फसल का अवशेष अब बन गया है विशेष, करेंगे सही उपयोग

 पूर्णिया                                                                          
फसल की कटाई के बाद जो अवशेष खेतों में बच जाता है वो दरअसल अवशेष नहीं बल्कि विशेष है, इस बात को किसान अगर समझ जाएं तो पैदावार लेने में क्रांति आ सकती है। इससे न सिर्फ किसानों को फायदा होगा बल्कि पर्यावरण और लोगो की सेहत भी बेहतर बनी रहेगी। पराली जलाने से रोकने के विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल होकर लौटे किसानों ने बताया कि अब फसल अवशेष अब उनकी नजर में विशेष बन गया है।

वियार पुर के किसान सुनील चौहान कहते हैं कि 14 और 15 अक्टूबर को पटना में आयोजित कार्यक्रम से लौटने के बाद फसल अवशेषों के प्रति उनका नजरिया ही बदल गया है। जिसे आज तक बेकार समझते आ रहे थे वो अब उनकी नजर में विशेष बन गया है। उन्होंने अपने पिता दुर्गा प्रसाद चौहान को भी फसल अवशेष के फायदे के बारे में बताया है। इसके अलावा अपने जानने वाले सभी किसानों को भी इसके बारे में जागरूक कर रहे हैं। दीवानगंज के किसान शिव कुमार महतो ने बताया कि धान के पुआल में जीवाणु होते हैं। ये पहली बार पता चला। वो कहते हैं कि कार्यक्रम में शामिल होने के बाद अब अफसोस हो रहा है कि पहले हम लोग कितना नुकसान उठा चुके हैं। अब तो तय कर लिया है कि किसी भी किसान को पराली या फसल अवशेष को जलाने नहीं देंगे। बल्कि उनको जागरूक करेंगे कि अवशेष को खेत में गला दें लेकिन जलाएं नहीं। बीकोठी ठारी पंचायत के किसान घनश्याम कुमार ने बताया कि शनिवार को केवीके के वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह, डॉ. हेमंत कुमार, अनिल जायसवाल उनके खेत पर आए थे। उन्होंने बताया कि खेत में मौजूद धान के अवशेष को जलाने के बजाए नहीं बल्कि उसका सही इस्तेमाल करें। जलाने से खेत और पार्यावरण दोनों को नुकसान होता है। किसान ने बताया कि आगे से वो दूसरे किसानों को इसके प्रति जागरूक करेंगे।

केवीके के कृषि वैज्ञानिक डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह कहते हैं कि फसल अवशेषों में 25 प्रतिशत नाइट्रोजन, 25 प्रतिशत फास्फोरस, 50 प्रतिशत गंधक और 75 प्रतिशत पोटाशियम मौजूद रहता है। जो अवशेषों को पोषण का श्रोत बना देता है। केवीके की हेड डॉ. सीमा कुमारी कहती हैं कि किसान फसल अवशेष को बेकार न समझें और किसानों को इसका सही मूल्य मिल सके, सरकार इसके लिए योजना बना रही है। उन्होंने बताया कि अवशेषों को जलाने से न सिर्फ मिट्टी का नुकसान होता है बल्कि पार्यावरण को नुकसान पहुंचता है। इसलिए किसानों को समझना होगा कि फसल अवशेष बेकार नहीं बल्कि विशेष है।

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